top of page

लेख अभिलेखागार  

3.jpeg

खेती-बाड़ी में परिवर्तन: हिमाचल की लाहौल घाटी से एक कहानी
छेरिंग गाजी द्वारा लिखित

मुझे याद है मैं जब छोटा था, तब हम याक या बैलों की मदद से खेत जोतते थे। इस तरह के पारम्परिक तरीकों में कम से कम दो व्यक्ति एवं दो याक लगते थे, परन्तु अब मशीनों के कारण यही काम एक व्यक्ति भी कर सकता है। करीब 30-40 साल पहले हम लोग कठ्ठु/कथु, जौ, काला मटर, ला्हौल में उगाते थे जो हमा्री आवश्यकताओं के लिये पर्याप्त था।

7_edited.jpg

खेती-बाड़ी में परिवर्तन: हिमाचल की लाहौल घाटी से एक कहानी
छेरिंग गाजी द्वारा लिखित

मुझे याद है मैं जब छोटा था, तब हम याक या बैलों की मदद से खेत जोतते थे। इस तरह के पारम्परिक तरीकों में कम से कम दो व्यक्ति एवं दो याक लगते थे, परन्तु अब मशीनों के कारण यही काम एक व्यक्ति भी कर सकता है। करीब 30-40 साल पहले हम लोग कठ्ठु/कथु, जौ, काला मटर, ला्हौल में उगाते थे जो हमा्री आवश्यकताओं के लिये पर्याप्त था।

10.jpg

खेती-बाड़ी में परिवर्तन: हिमाचल की लाहौल घाटी से एक कहानी
छेरिंग गाजी द्वारा लिखित

मुझे याद है मैं जब छोटा था, तब हम याक या बैलों की मदद से खेत जोतते थे। इस तरह के पारम्परिक तरीकों में कम से कम दो व्यक्ति एवं दो याक लगते थे, परन्तु अब मशीनों के कारण यही काम एक व्यक्ति भी कर सकता है। करीब 30-40 साल पहले हम लोग कठ्ठु/कथु, जौ, काला मटर, ला्हौल में उगाते थे जो हमा्री आवश्यकताओं के लिये पर्याप्त था।

13.jpeg

खेती-बाड़ी में परिवर्तन: हिमाचल की लाहौल घाटी से एक कहानी
छेरिंग गाजी द्वारा लिखित

मुझे याद है मैं जब छोटा था, तब हम याक या बैलों की मदद से खेत जोतते थे। इस तरह के पारम्परिक तरीकों में कम से कम दो व्यक्ति एवं दो याक लगते थे, परन्तु अब मशीनों के कारण यही काम एक व्यक्ति भी कर सकता है। करीब 30-40 साल पहले हम लोग कठ्ठु/कथु, जौ, काला मटर, ला्हौल में उगाते थे जो हमा्री आवश्यकताओं के लिये पर्याप्त था।

15_edited.jpg

खेती-बाड़ी में परिवर्तन: हिमाचल की लाहौल घाटी से एक कहानी
छेरिंग गाजी द्वारा लिखित

मुझे याद है मैं जब छोटा था, तब हम याक या बैलों की मदद से खेत जोतते थे। इस तरह के पारम्परिक तरीकों में कम से कम दो व्यक्ति एवं दो याक लगते थे, परन्तु अब मशीनों के कारण यही काम एक व्यक्ति भी कर सकता है। करीब 30-40 साल पहले हम लोग कठ्ठु/कथु, जौ, काला मटर, ला्हौल में उगाते थे जो हमा्री आवश्यकताओं के लिये पर्याप्त था।

Life of a Gaddi_5166.JPG

बदलते जलवायु की अनुगामी
वीरेन्द्र माथुर

हिमाचल प्रदेश के उत्तर पश्चिम भाग में स्थित भरमौर और लाहौल नामक मिथकीय क्षेत्र में, हर साल एक सामयिक घटना घटित है जो की स्थानीय संस्कृति और प्रकृति के बीच एक अनोखे सामंजस्य को दर्शाती है। गद्दी पाल के इस पारंपरिक गढ़ में, इस समुदाय को, सैमी-नोमैडिक, ट्रांसह्युमैंट पास्टोरैलिस्ट या एग्रो पास्टोरैलिस्ट कहा जाता है।

Picture 2.jpg

मेरी दादी माँ की अविस्मरणीय यादें
चैमी ल्हामो

जब मैं छोटी थी, तो मुझे याद है मेरी इवी (दादी माँ) रोजाना सुबह प्रार्थना करने के लिए मुझे युल-सा (गांव के देवता का बौद्ध मठ) ले जाया करती थी। वे मुझसे मक्खन वाले दीपक जलाने को कहती, वे स्वयं इस दौरान वेदी की परिक्रमा करती थीं और फिर मेरे साथ प्रार्थना करने लगती थीं। मैं प्रार्थना में मांगती थी कि घर में लगातार बिजली आती रहे, ताकि मैं पूरे दिन टेलीविजन देख सकूं।

Illustration 1.jpg

किब्बर के जल प्रबंधक
रंजिनी मुरली

सामने दूरी पर, पहाड़ की चोटियों पर सुबह-सुबह धूप की किरणें, जैसे छायाओं का पीछा करके उन्हें भगा रही थीं। मैं धूप वाले सुनहरे हिस्सों को देख कर ये सोच रही थी कि आखिर कब तक मैं इन किरणों की गरमाई का अनुभव कर पाऊंगी। लोबज़ांग ने मुझे देखा और हंसते हुए बोली, "ठंड लग रही है? मेरी मदद करो, इससे शरीर में गर्मी आएगी!"

Picture 1.jpg

स्पीति घाटी में शुष्क शौचालयों का पर्यावरणीय महत्व
सोनम यांगजॉम

स्पीति में ‘वेस्ट’ यानी कचरा नाम की कोई चीज ही नहीं होती। स्पीति के शौचालय के डिजाइन और यहाँ के नाजुक पर्यावास के बीच के इस रिश्ते के कारण फसलें अच्छी होती हैं, और इस क्षेत्र को पानी के संकट का सामना भी नहीं करना पड़ता। इस प्रकार शुष्क शौचालयों का प्रयोग ठंडे रेगिस्तान की भौगोलिक मजबूरियों से उपजा, एक पर्यावरण अनुकूल ज्ञान है, और सर्दियों में विशेष रूप से उपयोगी साबित होता है, जब पानी जम जाता है।

_MG_0886_.JPG

खेती-बाड़ी में परिवर्तन: हिमाचल की लाहौल घाटी से एक कहानी
छेरिंग गाजी द्वारा लिखित

मुझे याद है मैं जब छोटा था, तब हम याक या बैलों की मदद से खेत जोतते थे। इस तरह के पारम्परिक तरीकों में कम से कम दो व्यक्ति एवं दो याक लगते थे, परन्तु अब मशीनों के कारण यही काम एक व्यक्ति भी कर सकता है। करीब 30-40 साल पहले हम लोग कठ्ठु/कथु, जौ, काला मटर, ला्हौल में उगाते थे जो हमा्री आवश्यकताओं के लिये पर्याप्त था।

Picture 2.jpg

खेती-बाड़ी में परिवर्तन: हिमाचल की लाहौल घाटी से एक कहानी
छेरिंग गाजी द्वारा लिखित

मुझे याद है मैं जब छोटा था, तब हम याक या बैलों की मदद से खेत जोतते थे। इस तरह के पारम्परिक तरीकों में कम से कम दो व्यक्ति एवं दो याक लगते थे, परन्तु अब मशीनों के कारण यही काम एक व्यक्ति भी कर सकता है। करीब 30-40 साल पहले हम लोग कठ्ठु/कथु, जौ, काला मटर, ला्हौल में उगाते थे जो हमा्री आवश्यकताओं के लिये पर्याप्त था।

Kibber for Tandup article - BG (2).jpg

स्पीती घाटी की खेती-बाड़ी के तरीके
लोबज़ंग तांदुप द्वारा लिखित

लोग, वन्य जीव और प्रकृति का आपस में रिश्ता यहाँ केवल संसाधन के रूप में नहीं है। ये रिश्ता यहाँ की संस्कृति और रिति रिवाज़ो से भी गहराई से जुड़ा हुआ है। जैसे कि स्पिति में रहने वाले अनेक परिवार अपने खेतों के नाम रखते है। यह नाम ना केवल खेतों को ढूंढ़ने में काम आते हैं बल्कि उनका एक विशेषता बयान करते हैं।

khagta-himanshu-spiti-june-demul-village-8689.jpg

स्पीति में पारंपरिक खेती - एक चित्र कथा
हिमांशु खगटा द्वारा लिखित

ऑर्गेनिक खेती की अवधारणा, जो पिछले एक दशक में प्रसिद्ध हो गई है, स्पीति के लिए नई नहीं है। यद्यपि कृषि में कीटनाशकों के उपयोग ने इस क्षेत्र में लोकप्रियता हासिल की है, फिर भी काले मटर और जौ जैसी फसलें अभी भी किसी भी रसायन से मुक्त हैं। तो अगली बार जब आपके पास साम्पा (जौ के आटे से बना स्थानीय स्पीति का दलिया) हो, तो आप इसकी शुद्धता के बारे में निश्चित हो सकते हैं।

Fields in Lahual. Photo - Vikram Katoch  (3).jpeg

मेरी खेती की यादें
विक्रम सिंह कटोच द्वारा लिखित

लाहौल में बिजाई का मौसम मार्च के मध्य से शुरू होता है। लोग पहले खेतों से बर्फ साफ करते हैं और फिर विभिन्न बीजों की बिजाई शुरू करते हैं। हरे मटर और फूलगोभी के बीज सबसे पहले बोए जाते हैं और उसके बाद आलू। यहाँ खेती कई लोगों की एकमात्र आजीविका है और जुताई से पहले, लोग अच्छी फसल की उम्मीद में अपने खेतों, औजारों और बांग (बैल) की प्रार्थना करते हैं।

Vicky pictures  (1).jpeg

लाहौल स्पीति में कृषि का बदलता स्वरूप
विक्की द्वारा लिखित

मुझे याद है, सर्दियों का मौसम खत्म होते ही, जब वसंत के मौसम में खेती शुरू होती थी तब खेतों में काम करना बहुत अच्छा लगता था। मेरा परिवार फिर खेत जोतने के मुश्किल कार्य मे लग जाता था जो कुछ दिन तक चलता था। खेत के मुश्किल हिस्सा को, शालू जो की मेरी सबसे प्यारी घोड़ी थी, उससे जुतवाया जाता।

Photo - Kalzang Ladey (9).jpeg

स्पीति में मशरूम की खेती
कलजांग लादे द्वारा लिखित

स्पीति की मोनो सांस्कृतिक प्रथाओं को देखते हुए, मैंने महसूस किया कि स्पीति में मशरूम की खेती स्थानीय लोगों के लिए एक व्यवहार्य विकल्प प्रदान करेगी। मशरूम उगाना काफी आसान है और कोई भी इस प्रक्रिया को तब दोहरा सकता है जब वे इससे थोड़ा परिचित हो जाएं। बिना किसी यांत्रिक उपकरण के मशरूम की खेती साल में 2-3 बार आसानी से की जा सकती है।

Barley (jau).jpeg

कृषि जीवन की यादें
पृथ्वी सिंह और पनमा ग्यात्सो की बातचीत

मेरा जन्म हांगो (11,500 फीट) में हुआ था जो किन्नौर की हंगरंग घाटी में एक सुदूर गांव है। मेरी उम्र 72 साल है और मैंने अपना जीवन इस गांव में एक कृषि-पशुपालक किसान के रूप में बिताया है। खेती-बाड़ी हमारे लिए बहुत महत्वपूर्ण है। जब मैं पुरानी बातें याद करता हूँ तो मुझे एहसास होता है कि मेरी सबसे क़ीमती यादें खेतों और खाने से जुडी हुई हैं। मेरी सबसे पसंदीदा और ज्वलंत बचपन की यादें उस समय की हैं जब चुल्ली (खुबानी) का मौसम आता था।

WhatsApp Image 2022-02-07 at 12.33.59 PM (1).jpeg

शल्खर में सेब की खेती को पुनरजीवित करना
शालकर, किन्नौरी के सेब किसानों द्वारा सुनाई कहानी

हिमाचल प्रदेश में किन्नौर घाटी सेब की खेती के लिए प्रसिद्ध है। ये ऊँची पहाड़ियाँ सर्दियों में अपेक्षित ठंड के मौसम के साथ-साथ सेब की फसलों के लिए आदर्श जलवायु परिस्थितियाँ प्रदान करती हैं। सेब की एक किस्म जिसे मालुस पुमिला के नाम से जाना जाता है, पूरे ऊपरी किन्नौर घाटी में व्यापक रूप से उगाई जाने वाली नकदी फसल है। शल्खर गांव विशेष रूप से ऑर्गेनिक सेब उगाने के लिए जाना जाता है जो इसकी मिठास और कुरकुरेपन के लिए बहुत प्रतिष्ठित है।

Agro tourism camp in Lahual - tashi Angrup.jpg

खेती से परे - लाहौल में खेत-आधारित व्यवसाय
छिमे ल्हामो का तशी आंगरुप से बातचीत

हिमालय क्षेत्र में खेती में बहुत बदलाव आए है। एक प्रमुख बदलाव है - जीवन के गुज़र-बसर के लिए की जा रही खेती से निकलकर व्यावसायिक खेती करना। किसान अब अधिक आय देने वाली नकदी फसलें लगा रहे हैं व विविध प्रकार की फसलें उगा रहे हैं। बढ़ती कनेक्टिविटी के कारण किसान अब बहुत कुछ जान और सीख भी रहे हैं।

Chunnit Gue Story  (1).jpeg

एक शांत हताशा
चुनित छेरिंग

Nestled at the foothills of gigantic mountains, my village Gue is located south – east of Spiti near the Indo-China border. Away from the hustle-bustle of urban plains, we have always lived a quiet life.

WhatsApp Image 2022-07-25 at 11.19.23 AM.jpeg

पानी का मालिक कौन है?
छेरिंग अंगचुक

स्पीति में हम धन और समृद्धि को पानी के संदर्भ में परिभाषित करते हैं - "चू संग-ना, यूल संग" अभिव्यक्ति का उपयुक्त अनुवाद "समृद्ध गांवों में प्रचुर मात्रा में पानी के परिणाम" के रूप में होता है। उच्च हिमालय में एक ठंडा रेगिस्तान होने के कारण, पानी की तुलना में लोगों और उनकी अर्थव्यवस्थाओं की भलाई के लिए अधिक आवश्यक संसाधन के बारे में सोचना मुश्किल है, फिर भी जल संसाधनों का प्रबंधन एक जटिल और चुनौतीपूर्ण कार्य है...

SLE PROFILE.jpg

महिला और जल: एक फोटो कहानी
एकाधिक योगदानकर्ता

पिछले साल, हमने शुशुना गाँव, स्पीति घाटी में महिलाओं के समूह के साथ एक फोटोग्राफी कार्यशाला की, जो अपने घरों में प्राथमिक देखभाल करने वाली और किसान हैं। सत्र के बाद, हमने उन्हें एक कैमरा छोड़ा और उनसे उनके फोटोग्राफी कौशल को पोषित करने के अलावा उनके ग्रामीण जीवन का दस्तावेजीकरण करने के लिए कहा। हम एक साल बाद लौटे और उन्होंने हमें अद्भुत चित्रों और बेहतरीन कहानियों से मंत्रमुग्ध कर दिया!

Dhankhar online  (3).png

पानी से जुड़ी कई कहानियां
कलजंग डोलमा

स्पीति के मौखिक साहित्य में जल का व्यापक संदर्भ है। कई प्राचीन छंद, गीत, भजन, लोक गीत, पुरानी विद्या पानी के प्रति श्रद्धा के साथ संकेत करते हैं, इसे एक खजाने के रूप में संदर्भित करते हैं और भौतिक, पारिस्थितिक, सामाजिक-सांस्कृतिक और आध्यात्मिक संदर्भों के भीतर पैतृक संबद्धता को मूर्त रूप देते हैं। प्रत्येक आख्यान स्थानीय स्थान में गहराई से अंतर्निहित है - जन्म की मिट्टी, जल निकायों और उनकी जटिल अभिव्यक्ति के साथ घनिष्ठ रूप से जुड़ा हुआ है ...

WhatsApp Image 2022-07-25 at 12.11.25 PM.jpeg

चीचम की महिलाओं से बातचीत में
एकाधिक कहानीकार

यह लेख तंजीन दावा के नेतृत्व में अने दीक्षित लामो और पद्मा नोरजोम के साथ एक बातचीत है|

WhatsApp Image 2022-07-26 at 10.01.44 AM.jpeg

Unpredictable Lifelines
By Sunder Negi

प्रार्थना के छंद पूरी घाटी में गूंजते हैं क्योंकि पुरुष गाते हैं और पहाड़ों पर चढ़ते हैं ताकि यह सुनिश्चित हो सके कि उनके गांव में गर्मियों में पानी हो। खदरा, अकपा और रारंग गांव के लोग पांगी टॉप तक पहुंचने के लिए 27 किमी की यात्रा करते हैं और कृत्रिम धारा - कशंग नहर का रास्ता साफ करते हैं ताकि पानी उनके गांवों की ओर स्वतंत्र रूप से बह सके।

Looms - Dorjee (17).JPG

The Art of Weaving in Lahaul’s
Upper Valleys 

By Rinchen Angmo & Chhering Gajji

In the higher Himalayan region, weaving is an ancient craft and forms an integral part of people’s lives. In Lahaul, weaving signifies a retreat into slower, simpler times amid icy cold weather when the farming works are at its lowest. There’s a saying in local folklore attributing weaving as visual art that reflects stories about people, their communities, and their place in the universe.

shawll.jpg

हिमालय की भेड़ - एक घरेलू ऊनी उद्यम
अनुराधा मियान

हथकरघा और हस्तशिल्प किन्नौर (हिमाचल प्रदेश) में एक पुरानी परंपरा है और इसकी जड़ें प्राचीन व्यापार मार्गों में हैं।जटिल डिजाइन और रंगीन पैटर्न किन्नौरी दस्तकारी शॉल को अलग रूप देते हैं- जिसके कारण यह भारत में एक बहुत ही प्रतिष्ठित कपड़ा उत्पाद हैं। हालाँकि, इसके इतिहास, प्रतीकवाद और समकालीन प्रासंगिकता का बड़ा हिस्सा आज भी अस्पष्ट है।

Pashmina combing  (1).jpg

चांगथांग - हिमालयन फाइबर का समृद्ध मरूद्यान
पदमा डोलकर

ऊंचे ट्रांस-हिमालयी पहाड़ों के बीच स्थित, चांगथांग एक अनूठा इलाका है जहां जलवायु और स्थल स्थानीय समुदायों के निर्वाह में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। इस क्षेत्र में विस्तृत आर्द्रभूमि (वेटलैंड) और विशाल पहाड़ हैं जो हमारे जल और खाद्य सुरक्षा के लिये प्राकृतिक देन है। चांगथांग में कई आर्द्रभूमि ऊंचाई पर स्थित हैं और आसपास के पहाड़ों की हिमनदों और बर्फ से पोषित हैं।

WhatsApp Image 2022-10-29 at 11.55.27 AM (2).jpeg

स्पीति में पारम्परिक हस्तकरगा वस्त्र
डोलमा जंगमो, छेरिंग जंगमो और तंजिन अंकित

पहनावे और पहचान में बहुत गहरा संबंद है। पारम्परिक परिधान किसी भी क्षेत्र के भौतिक पर्यावरण, जलवायुवीय परिस्थितियाँ के बारे में बहुत कुछ जानकारी देता है। स्पीति ऊँचे एवं ठंडे क्षेत्र में होने के कारण यहाँ के लोगों में भिन्न-भिन्न तरह के परिधनो का चलन है।क्योंकि यहाँ के अधिकतर लोग मिश्रित कृषि करते हैं तथा जिन पशुधनो को यहाँ के लोग पालते हैं उनसे कई प्रकार के जांतव रेशे जैसे याक का ऊन, भेड़ों का ऊन बकरी से प्राप्त रेशा आदि ही यहाँ के लोगों के पहनावे का मुखिया साधन हैं। पुराने समय में लोग हाथों से बुने वस्त्र एवं आभूषणो का उपयोग....

WhatsApp Image 2022-09-16 at 11.06.19 AM.jpeg

टेपंग : किन्नौर की शान
तंजिन पलकित नेगी

खूबसूरत विशाल पर्वत श्रृंखलाओं के बीच बसा, किन्नौर हिमाचल प्रदेश के सबसे सुंदर जिलों में से एक है। स्पीति से इसकी भौगोलिक निकटता और ऐतिहासिक रूप से रामपुर बुशहर का हिस्सा होने के कारण, किन्नौर बौद्धों और हिंदुओं के अनूठे सांस्कृतिक मिश्रण को दर्शाता है। किन्नौर में रहने वाले लोगों की परिभाषित विशेषताओं में से एक उनकी जीवंत पारंपरिक परिधान और टेपंग  है जो पूरे पोशाक का एक अभिन्न अंग है। टोपी को बोलचाल की भाषा में "टेपंग" या "खुन्नू (किन्नौरी) तिवी (टोपी ) खुन्नू तिवी  "कहा जाता है और यह शिमला, कांगड़ा, कुल्लू और चंबा के हिमाचली टोपियों से अलग है।

Looms - Dorjee (17).JPG

The Art of Weaving in Lahaul’s
Upper Valleys 

By Rinchen Angmo & Chhering Gajji

In the higher Himalayan region, weaving is an ancient craft and forms an integral part of people’s lives. In Lahaul, weaving signifies a retreat into slower, simpler times amid icy cold weather when the farming works are at its lowest. There’s a saying in local folklore attributing weaving as visual art that reflects stories about people, their communities, and their place in the universe.

shawll.jpg

हिमालय की भेड़ - एक घरेलू ऊनी उद्यम
अनुराधा मियान

हथकरघा और हस्तशिल्प किन्नौर (हिमाचल प्रदेश) में एक पुरानी परंपरा है और इसकी जड़ें प्राचीन व्यापार मार्गों में हैं।जटिल डिजाइन और रंगीन पैटर्न किन्नौरी दस्तकारी शॉल को अलग रूप देते हैं- जिसके कारण यह भारत में एक बहुत ही प्रतिष्ठित कपड़ा उत्पाद हैं। हालाँकि, इसके इतिहास, प्रतीकवाद और समकालीन प्रासंगिकता का बड़ा हिस्सा आज भी अस्पष्ट है।

Pashmina combing  (1).jpg

चांगथांग - हिमालयन फाइबर का समृद्ध मरूद्यान
पदमा डोलकर

ऊंचे ट्रांस-हिमालयी पहाड़ों के बीच स्थित, चांगथांग एक अनूठा इलाका है जहां जलवायु और स्थल स्थानीय समुदायों के निर्वाह में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। इस क्षेत्र में विस्तृत आर्द्रभूमि (वेटलैंड) और विशाल पहाड़ हैं जो हमारे जल और खाद्य सुरक्षा के लिये प्राकृतिक देन है। चांगथांग में कई आर्द्रभूमि ऊंचाई पर स्थित हैं और आसपास के पहाड़ों की हिमनदों और बर्फ से पोषित हैं।

WhatsApp Image 2022-10-29 at 11.55.27 AM (2).jpeg

स्पीति में पारम्परिक हस्तकरगा वस्त्र
डोलमा जंगमो, छेरिंग जंगमो और तंजिन अंकित

पहनावे और पहचान में बहुत गहरा संबंद है। पारम्परिक परिधान किसी भी क्षेत्र के भौतिक पर्यावरण, जलवायुवीय परिस्थितियाँ के बारे में बहुत कुछ जानकारी देता है। स्पीति ऊँचे एवं ठंडे क्षेत्र में होने के कारण यहाँ के लोगों में भिन्न-भिन्न तरह के परिधनो का चलन है।क्योंकि यहाँ के अधिकतर लोग मिश्रित कृषि करते हैं तथा जिन पशुधनो को यहाँ के लोग पालते हैं उनसे कई प्रकार के जांतव रेशे जैसे याक का ऊन, भेड़ों का ऊन बकरी से प्राप्त रेशा आदि ही यहाँ के लोगों के पहनावे का मुखिया साधन हैं। पुराने समय में लोग हाथों से बुने वस्त्र एवं आभूषणो का उपयोग....

WhatsApp Image 2022-09-16 at 11.06.19 AM.jpeg

टेपंग : किन्नौर की शान
तंजिन पलकित नेगी

खूबसूरत विशाल पर्वत श्रृंखलाओं के बीच बसा, किन्नौर हिमाचल प्रदेश के सबसे सुंदर जिलों में से एक है। स्पीति से इसकी भौगोलिक निकटता और ऐतिहासिक रूप से रामपुर बुशहर का हिस्सा होने के कारण, किन्नौर बौद्धों और हिंदुओं के अनूठे सांस्कृतिक मिश्रण को दर्शाता है। किन्नौर में रहने वाले लोगों की परिभाषित विशेषताओं में से एक उनकी जीवंत पारंपरिक परिधान और टेपंग  है जो पूरे पोशाक का एक अभिन्न अंग है। टोपी को बोलचाल की भाषा में "टेपंग" या "खुन्नू (किन्नौरी) तिवी (टोपी ) खुन्नू तिवी  "कहा जाता है और यह शिमला, कांगड़ा, कुल्लू और चंबा के हिमाचली टोपियों से अलग है।

Kesang Chhunit (16).JPG

लाहौल की ऊंची घाटियों में बुनाई की कला
रिंगचेन अंगमो और छेरिंग गाज्जी के साथ बातचीत

उच्च हिमालयी क्षेत्र में, बुनाई एक प्राचीन हस्तकला है और लोगों के जीवन का एक अभिन्न अंग है। लाहौल में, बुनाई बर्फीले ठंडे मौसम के बीच धीमी, सरल समय में वापसी का प्रतीक है जब खेती का काम अपने सबसे निचले स्तर पर होता है। स्थानीय पौराणिक कथाओं के कहावत के अनुसार बुनाई एक ऐसा दृश्य कला है जो लोगों उनके समुदायों और सृष्टि में उनके स्थान के बारे में कहानियों को दर्शाती है।

Additional DG, ASI Janhwij Sharma (2) (1) (1).jpg

हिमालय की भेड़ - एक घरेलू ऊनी उद्यम
अनुराधा मियान

हथकरघा और हस्तशिल्प किन्नौर (हिमाचल प्रदेश) में एक पुरानी परंपरा है और इसकी जड़ें प्राचीन व्यापार मार्गों में हैं।जटिल डिजाइन और रंगीन पैटर्न किन्नौरी दस्तकारी शॉल को अलग रूप देते हैं- जिसके कारण यह भारत में एक बहुत ही प्रतिष्ठित कपड़ा उत्पाद हैं। हालाँकि, इसके इतिहास, प्रतीकवाद और समकालीन प्रासंगिकता का बड़ा हिस्सा आज भी अस्पष्ट है।

Chemi  (4).jpg

चांगथांग - हिमालयन फाइबर का समृद्ध मरूद्यान
पदमा डोलकर

ऊंचे ट्रांस-हिमालयी पहाड़ों के बीच स्थित, चांगथांग एक अनूठा इलाका है जहां जलवायु और स्थल स्थानीय समुदायों के निर्वाह में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। इस क्षेत्र में विस्तृत आर्द्रभूमि (वेटलैंड) और विशाल पहाड़ हैं जो हमारे जल और खाद्य सुरक्षा के लिये प्राकृतिक देन है। चांगथांग में कई आर्द्रभूमि ऊंचाई पर स्थित हैं और आसपास के पहाड़ों की हिमनदों और बर्फ से पोषित हैं।

Lama Thamo (3)_edited.jpg

स्पीति में पारम्परिक हस्तकरगा वस्त्र
डोलमा जंगमो, छेरिंग जंगमो और तंजिन अंकित

पहनावे और पहचान में बहुत गहरा संबंद है। पारम्परिक परिधान किसी भी क्षेत्र के भौतिक पर्यावरण, जलवायुवीय परिस्थितियाँ के बारे में बहुत कुछ जानकारी देता है। स्पीति ऊँचे एवं ठंडे क्षेत्र में होने के कारण यहाँ के लोगों में भिन्न-भिन्न तरह के परिधनो का चलन है।क्योंकि यहाँ के अधिकतर लोग मिश्रित कृषि करते हैं तथा जिन पशुधनो को यहाँ के लोग पालते हैं उनसे कई प्रकार के जांतव रेशे जैसे याक का ऊन, भेड़ों का ऊन बकरी से प्राप्त रेशा आदि ही यहाँ के लोगों के पहनावे का मुखिया साधन हैं। पुराने समय में लोग हाथों से बुने वस्त्र एवं आभूषणो का उपयोग....

WhatsApp Image 2023-03-08 at 8.24_edited.jpg

टेपंग : किन्नौर की शान
तंजिन पलकित नेगी

खूबसूरत विशाल पर्वत श्रृंखलाओं के बीच बसा, किन्नौर हिमाचल प्रदेश के सबसे सुंदर जिलों में से एक है। स्पीति से इसकी भौगोलिक निकटता और ऐतिहासिक रूप से रामपुर बुशहर का हिस्सा होने के कारण, किन्नौर बौद्धों और हिंदुओं के अनूठे सांस्कृतिक मिश्रण को दर्शाता है। किन्नौर में रहने वाले लोगों की परिभाषित विशेषताओं में से एक उनकी जीवंत पारंपरिक परिधान और टेपंग  है जो पूरे पोशाक का एक अभिन्न अंग है। टोपी को बोलचाल की भाषा में "टेपंग" या "खुन्नू (किन्नौरी) तिवी (टोपी ) खुन्नू तिवी  "कहा जाता है और यह शिमला, कांगड़ा, कुल्लू और चंबा के हिमाचली टोपियों से अलग है।

Chhonzom ama (1).jpeg

टेपंग : किन्नौर की शान
तंजिन पलकित नेगी

खूबसूरत विशाल पर्वत श्रृंखलाओं के बीच बसा, किन्नौर हिमाचल प्रदेश के सबसे सुंदर जिलों में से एक है। स्पीति से इसकी भौगोलिक निकटता और ऐतिहासिक रूप से रामपुर बुशहर का हिस्सा होने के कारण, किन्नौर बौद्धों और हिंदुओं के अनूठे सांस्कृतिक मिश्रण को दर्शाता है। किन्नौर में रहने वाले लोगों की परिभाषित विशेषताओं में से एक उनकी जीवंत पारंपरिक परिधान और टेपंग  है जो पूरे पोशाक का एक अभिन्न अंग है। टोपी को बोलचाल की भाषा में "टेपंग" या "खुन्नू (किन्नौरी) तिवी (टोपी ) खुन्नू तिवी  "कहा जाता है और यह शिमला, कांगड़ा, कुल्लू और चंबा के हिमाचली टोपियों से अलग है।

Pin-Valley-House-1536x1152.jpg

टेपंग : किन्नौर की शान
तंजिन पलकित नेगी

खूबसूरत विशाल पर्वत श्रृंखलाओं के बीच बसा, किन्नौर हिमाचल प्रदेश के सबसे सुंदर जिलों में से एक है। स्पीति से इसकी भौगोलिक निकटता और ऐतिहासिक रूप से रामपुर बुशहर का हिस्सा होने के कारण, किन्नौर बौद्धों और हिंदुओं के अनूठे सांस्कृतिक मिश्रण को दर्शाता है। किन्नौर में रहने वाले लोगों की परिभाषित विशेषताओं में से एक उनकी जीवंत पारंपरिक परिधान और टेपंग  है जो पूरे पोशाक का एक अभिन्न अंग है। टोपी को बोलचाल की भाषा में "टेपंग" या "खुन्नू (किन्नौरी) तिवी (टोपी ) खुन्नू तिवी  "कहा जाता है और यह शिमला, कांगड़ा, कुल्लू और चंबा के हिमाचली टोपियों से अलग है।

bottom of page