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लाहौल स्पीति में कृषि का बदलता स्वरूप

मुझे याद है, सर्दियों का मौसम खत्म होते ही, जब वसंत के मौसम में खेती शुरू होती थी तब खेतों में काम करना बहुत अच्छा लगता था। जिस दिन खेतों को जोतना होता था उस दिन स्कूल से आवश्यक कार्य का बहाना मार कर मैं छुट्टी लेने की कोशिश करता था। जुताई से एक दिन पहले से ही घर मे बहुत खुशनुमा माहौल होता था और खेती मे इस्तेमाल होने वाला सारा सामान जुटाया जाता था। एक दिन पहले दूसरे गाँव से बैल भी लाए जाते थे और बैलों को हल के लिए तैयार किया जाता था। सब तयारी करने के बाद अगले दिन का इंतज़ार मुझे सोने नहीं देता था। सारी रात, मैं स्कूल से कैसे छुट्टी लूं, उसके बहाने ही सोचता रहता था।

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फोटो साभार: विक्की

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फोटो साभार: विक्की

अगले दिन सबसे पहले मेरे दादा जी हमारे गांव की स्थानीय देवी जोगणी को सत्तू से बनी भेंट चढ़ाते थे। फिर उनका आर्शीवाद और प्रसाद लेकर,खेत में जाने की तयारी करते थे। खेतों में जाने से पहले, शुभ कार्य किये जाते थे और बैलों के सींगों मैं फूल लगाए जाते थे। उसके बाद हम बैलों को खेतों की ओर लेकर चल पड़ते थे और मैं भी बैलों को पकड़ता था और मुझे इस मे बहुत ख़ुशी मिलती थी। पारंपरिक अनुष्ठान के लिए अम्मा भुने हुए गेहूं (खा) और छांग (स्थानीय शराब) लाती थी। खेतों में पहुंचते ही हम बैलों को हम 2-2 की टीम मे बाँट देते थे और उनके साथ हल को जोड़ देते थे। उसके बाद हम छांग और खा धरती को अर्पित करते हुए पूर्व दिशा की ओर मुड़ कर प्रार्थना करते थे।

 

मेरा परिवार फिर खेत जोतने के मुश्किल कार्य मे लग जाता था जो कुछ दिन तक चलता था। खेत के मुश्किल हिस्सा को, शालू जो की मेरी सबसे प्यारी घोड़ी थी, उससे जुतवाया जाता। दुर्भाग्य से मुझे स्कूल से खेती के लिए कभी छुट्टी नहीं मिलती थी इसलिए जैसे ही सारे अनुष्ठान ख़तम होते, मुझे तुरंत ही स्कूल को भागना पड़ता था। दोपहर का खाना 12:30 बजे कम्युनिटी बांटा जाता था। बैलों को किसान सत्तू और छांग से बनाई गयी पिन्नियां खिलते थे जिससे उनको काम करने की शक्ति मिले। खाना खाने के बाद किसान एक घंटे का आराम कर के फिर काम मे जुट जाते थे।

 

शाम को 6 बजे जब किसान चाय और पूरी का मज़्ज़ा ले रहे होते थे, तब हम सब बच्चे भी स्कूल से वापिस आ जाते थे। फिर रात होने तक हम अपने माता पिता के साथ खेतों मे उनकी मदद करते थे। अगर अँधेरा होने से पहले काम खत्म हो जाता था तब हम उबड़ खाबड़ खेतों को समतल करते थे। बैलों के पीछे से हल को निकल कर एक बड़ा लकड़ी का फट्टा लगा दिया जाता था और फिर खेतों में उनको चलवाया जाता था। फट्टे पे वज़्ज़न डालने के लिए हम बच्चे काम आते थे। हम एक दुसरे से लड़ाई करते थे उस फट्टे पर बैठने के लिए और दिन खत्म होने तक हम सब मिट्टी में सने होते थे। हमने बच्चपन में काफी मज्जे किये हैं।

आज के ज़माने में कृषि बहुत बदल गया है। आधुनिक तरीकों और औजारों ने काम को तो बहुत काम कर दिया है पर अब कृषि में पहले जैसा मज़्ज़ा नहीं रहा। पहले जब सारा परिवार और समुदाय एक साथ मिलकर खेती करते थे, आज कल बस एक ही व्यक्ति काफी है। इस आधुनिकता की वजह से ही पलायन भी मुमकिन हुआ है क्यूंकि अब महिलायें अकेली ही बड़ी आसानी से खेत सँभालने में सक्षम हैं।

लेखक के बारे में

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विक्की

विक्की लाहौल के मूलिंग गांव के रहने वाले हैं। उन्होंने सरकारी कॉलेज संजौली (शिमला, एच.पी) से भूगोल-शास्र का अध्ययन किया। उन्हें पहाड़ी घाटियों की खोज और ट्रेकिंग करना पसंद है। उनका मानना है कि हर पहाड़ अद्वितीय है और उसकी अपनी कहानी होती है।

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